बाबा साहेब के नाम वाली यूनिवर्सिटी में छात्रों का दर्द! वर्षों से रिजल्ट, मार्कशीट और प्रमाणपत्र के लिए भटक रहे विद्यार्थी

मुजफ्फरपुर स्थित बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय (BRABU) में छात्रों ने रिजल्ट पेंडिंग, मार्कशीट, प्रमाणपत्र और बुनियादी सुविधाओं की कमी को लेकर गंभीर शिकायतें उठाई हैं। छात्रों का कहना है कि उन्हें अपने शैक्षणिक कार्यों के लिए बार-बार विश्वविद्यालय के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, जिससे उनकी पढ़ाई और करियर प्रभावित हो रहा है।
बाबा साहेब के नाम वाली यूनिवर्सिटी में छात्रों का दर्द! वर्षों से रिजल्ट, मार्कशीट और प्रमाणपत्र के लिए भटक रहे विद्यार्थी
सालों का इंतजार, फिर भी समाधान नहीं… आखिर कब सुनेगी व्यवस्था छात्रों की आवाज?

BRABU Result Pending आज बिहार के हजारों छात्रों के लिए सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है। मुजफ्फरपुर स्थित बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय में छात्र वर्षों से रिजल्ट, मार्कशीट और प्रमाणपत्र के लिए भटक रहे हैं। छात्रों का कहना है कि कई बार आवेदन देने के बावजूद समय पर समाधान नहीं मिलता।

आज हम बात कर रहे हैं बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय की। यह वही विश्वविद्यालय है जिसका नाम भारत के संविधान निर्माता, भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर के नाम पर रखा गया है।

इस विश्वविद्यालय के कुलाधिपति बिहार के माननीय राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन जी हैं।

लेकिन सवाल यह है कि जिस विश्वविद्यालय से बिहार के हजारों-लाखों छात्रों का भविष्य जुड़ा हुआ है, आखिर वहां छात्रों को अपने ही काम के लिए इतना संघर्ष क्यों करना पड़ रहा है?

छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय में शिक्षा से ज्यादा उन्हें अपने छोटे-छोटे कामों के लिए परेशानियों का सामना करना पड़ता है। कोई छात्र रिजल्ट पेंडिंग होने से परेशान है, किसी की मार्कशीट में गलती है, किसी का रजिस्ट्रेशन नंबर गलत है तो किसी का रोल नंबर सुधार नहीं हो पा रहा है।

कई छात्र बताते हैं कि वे 100 से 200 किलोमीटर दूर से अपना काम कराने के लिए विश्वविद्यालय पहुंचते हैं। सुबह-सुबह घर से निकलते हैं, किराया खर्च करते हैं, खाने-पीने का खर्च उठाते हैं और उम्मीद लेकर विश्वविद्यालय आते हैं कि आज उनका काम पूरा हो जाएगा।

लेकिन कई बार पूरा दिन इंतजार करने के बाद भी उन्हें निराश होकर वापस लौटना पड़ता है।

छात्रों का आरोप है कि विश्वविद्यालय में कई बार अधिकारी और प्रोफेसर समय पर अपने कार्यालय में उपलब्ध नहीं रहते हैं। छात्र अपनी समस्या लेकर ऑफिस पहुंचते हैं, लेकिन घंटों इंतजार करने के बाद भी उनकी मुलाकात संबंधित अधिकारी से नहीं हो पाती।

जब छात्र कार्यालय में मौजूद कर्मचारियों से जानकारी मांगते हैं तो उन्हें सही जवाब नहीं मिलता। कोई कहता है कि हमें जानकारी नहीं है, दूसरे कमरे में जाइए। कोई कहता है कि वहां पता कीजिए।

छात्रों का सवाल है कि आखिर अपनी समस्या लेकर आने वाले विद्यार्थियों को सही मार्गदर्शन क्यों नहीं दिया जाता?

एक छात्र जब विश्वविद्यालय आता है तो वह अपना आवेदन, जरूरी दस्तावेज और उम्मीद लेकर आता है। लेकिन कई बार उसे कहा जाता है कि आवेदन जमा कर दीजिए, साहब आएंगे तो काम हो जाएगा।

छात्र आवेदन जमा करके वापस चले जाते हैं। फिर कई दिन बाद जब दोबारा आते हैं तो उन्हें फिर नई बात सुनने को मिलती है।

कभी कहा जाता है कि अधिकारी नहीं आए हैं।

कभी कहा जाता है कि संबंधित कर्मचारी नहीं हैं।

कभी कहा जाता है कि फाइल आगे भेज दी गई है।

और इस तरह छात्र फिर इंतजार करता रहता है।

छात्रों का कहना है कि कई बार उन्हें दोबारा आवेदन देना पड़ता है। दोबारा पैसा खर्च करना पड़ता है। दोबारा विश्वविद्यालय का चक्कर लगाना पड़ता है।

यह सिलसिला कई छात्रों के लिए महीनों नहीं बल्कि वर्षों तक चलता रहता है।

सबसे बड़ा दर्द उन छात्रों का है जिनका रिजल्ट पेंडिंग रहने के कारण उनकी आगे की पढ़ाई रुक जाती है। कई छात्र नौकरी के लिए आवेदन नहीं कर पाते क्योंकि उनके पास समय पर जरूरी दस्तावेज उपलब्ध नहीं हो पाते।

कई छात्र भावुक होकर कहते हैं कि विश्वविद्यालय का चक्कर लगाते-लगाते उनकी जिंदगी के महत्वपूर्ण साल निकल गए।

किसी ने कहा कि इंतजार करते-करते बाल सफेद हो गए।

किसी ने कहा कि पढ़ाई पूरी करने के बाद भी नौकरी के लिए आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं।

सवाल यह है कि आखिर एक छात्र की जिंदगी के इतने महत्वपूर्ण वर्षों की जिम्मेदारी कौन लेगा?

विश्वविद्यालय परिसर में आने वाले छात्रों की एक और बड़ी शिकायत बुनियादी सुविधाओं को लेकर है।

छात्रों का कहना है कि विश्वविद्यालय में बैठने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। दूर-दराज से आने वाले विद्यार्थी घंटों खड़े रहते हैं या मजबूरी में सीढ़ियों पर बैठकर अपनी बारी का इंतजार करते हैं।

गर्मी के दिनों में छात्र परेशान रहते हैं। पंखा ,बैठने और अन्य जरूरी सुविधाओं की कमी से छात्र और अभिभावक दोनों परेशान होते हैं।

छात्रों का कहना है कि जब वे अपनी समस्या लेकर आते हैं तो उन्हें ऐसा महसूस होता है जैसे उनकी कोई सुनने वाला व्यवस्था में नहीं है।

कुछ छात्रों ने यह भी आरोप लगाया है कि कई कार्यों को कराने के लिए उनसे पैसे की मांग की जाती है। हालांकि इन आरोपों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है, लेकिन अगर ऐसी शिकायतें सामने आ रही हैं तो विश्वविद्यालय प्रशासन को गंभीरता से जांच करानी चाहिए।

क्योंकि एक गरीब और सामान्य परिवार का छात्र जब विश्वविद्यालय आता है तो वह अपने भविष्य की उम्मीद लेकर आता है। उसके लिए हर दिन का खर्च और हर दिन की देरी बहुत मायने रखती है।

सवाल यह भी है कि अगर विश्वविद्यालय के कर्मचारी और अधिकारी समय पर अपनी जिम्मेदारी निभाएं, तो क्या हजारों छात्रों का भविष्य बेहतर नहीं हो सकता?

क्या छात्रों के लिए ऐसी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए जहां उन्हें एक ही जगह पर सही जानकारी मिले?

क्या ऐसा हेल्प डेस्क नहीं होना चाहिए जहां छात्र अपनी समस्या दर्ज कराकर तय समय में समाधान पा सकें?

बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने हमेशा शिक्षा, समानता और अधिकार की बात की थी। शिक्षा को उन्होंने समाज परिवर्तन का सबसे बड़ा माध्यम माना था।

ऐसे महान व्यक्ति के नाम से जुड़े विश्वविद्यालय में अगर छात्र अपने अधिकारों और अपने दस्तावेजों के लिए वर्षों तक भटकते हैं, तो यह एक गंभीर सवाल है।

यह सिर्फ एक छात्र की समस्या नहीं है। यह उन हजारों छात्रों की आवाज है जो अपने भविष्य के लिए इस व्यवस्था पर निर्भर हैं।

अब जरूरत है कि विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों की शिकायतों को गंभीरता से ले।

जरूरत है कि हर विभाग में जवाबदेही तय हो।

जरूरत है कि छात्रों को सम्मान के साथ सुना जाए।

और जरूरत है कि ऐसी व्यवस्था बने जहां किसी छात्र को अपने रिजल्ट, मार्कशीट या प्रमाणपत्र के लिए वर्षों तक कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें।

क्योंकि एक छात्र का समय सिर्फ समय नहीं होता, वह उसके सपनों और भविष्य की नींव होती है।

अब सवाल यही है — आखिर छात्रों की सुनवाई कब होगी?

रविन्द्र जाडेजा